चाणक्य - Chanakya
चाणक्य
मित्र इस कुश को खोदकर इसमें मट्ठा
क्यों डाल रहे हो ? 'इसका काँटा मेरे पैर में घुस गया है। मैंने काँटा तो निकाल लिया, किंतु यह फिर किसी के पैर में न चुभे
इसलिए इसे जड से नष्ट करना चाहिए। - यह वार्तालाप चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य के बीच का है | _________________________________________________________________________________________
अतः चाणक्य की गिनती विश्व के राजनीतिशास्त्र के महानतम चिन्तकों में की जाती है।
चाणक्य चन्द्रगुप्त के मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ चाणक्य का नाम
जुड़ा है।
चाणक्य की सहायता, परामर्श एवं राजनैतिक कूटनीति से चन्द्रगुप्त अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल हुए। चाणक्य का पूरा नाम 'विष्णु गुप्त चाणक्य' था।
उन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है।
चाणक्य तक्षशिला के एक ब्राह्मण के पुत्र थे। बाल्यकाल में ही पिता की मृत्यु हो जाने पर चाणक्य का पालन-पोषण उनकी माता ने किया। तक्षशिला में रहकर उन्होंने ज्ञानार्जन के साथ-साथ दर्शन का भी अध्ययन किया। चाणक्य परम विद्वान थे परंतु बहुत क्रोधी एवं उग्र स्वभाव के थे। युवा होने पर चाणक्य जीविकोपार्जन के लिये मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र पहुंचे।
वहाँ मगध के नंदवंशीय शासक घनानंद से
उनकी भेंट हुई। सम्राट ने चाणक्य को पाटलिपुत्र की दानशाला का प्रबंधक नियुक्त किया। कटु और उग्र स्वभाव होने के कारण चाणक्य
को यहाँ से पदच्युत कर दिया गया।
उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और
सम्राट घनानंद तथा नंद वंश के विनाश करने की प्रतिज्ञा ली। वह सदैव इस खोज में रहते कि प्रतिज्ञा कैसे पूरी करें। उसी समय उनकी
भेंट चन्द्रगुप्त से हुई।
चंद्रगुप्त बहुत महत्वाकांक्षी थे। वह
मगध साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते थे।
चाणक्य और चंद्रगुप्त के इस मिलन ने भारतीय इतिहास को एक नवीन दिशा की ओर मोड़ दिया। चंद्रगुप्त में बल था और चाणक्य में बुद्धि । बल और बुद्धि का यह संयोग भारतीय इतिहास में युग परिवर्तन की घटना सिद्ध हुआ।
चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने मिलकर पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया। घनानन्द की प्रबल सैन्य शक्ति के कारण वे पराजित हुए। साम्राज्य की शक्ति सदैव केन्द्र में स्थित रहती है और सीमान्त क्षेत्र में क्षीण ।
चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने अपनी रणनीति में परिवर्तन करके यह निर्णय लिया कि पहले मगध राज्य के सीमान्त क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की जाय तत्पश्चात् मगध राज्य पर आक्रमण करना उचित होगा।
इस नवीन योजना के अनुसार चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने पंजाब पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त की। इसके पश्चात चंद्रगुप्त एक विशाल सेना लेकर पाटलिपुत्र पहुँचा। इस युद्ध में घनानंद मारा गया।
चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की सहायता से मगध पर अधिकार प्राप्त कर लिया। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त का विधिवत राज्याभिषेक कर 321 ईपू में उसे मगध का सम्राट घोषित कर दिया। चाणक्य की बुद्धिमत्ता और कूटनीति के कारण चंद्रगुप्त ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री और प्रमुख परामर्शदाता नियुक्त कर लिया। चाणक्य ने जीवन के अन्तिम समय तक मौर्य साम्राज्य की सेवा की।
चाणक्य ने राजतंत्र को एक सर्वाधिक उपयोगी संस्था माना है। उनके अनुसार राजा को धर्मनिष्ठ,सत्यवादी, कृतज्ञ, बलशाली, वृद्धों का सम्मान करने वाला, उत्साही, विनयशील, विवेकी, निर्भीक, न्यायप्रिय,मृदुभाषी तथा कार्य निपुण होना चाहिए। उसे काम-क्रोध, मद-मोह, अहंकार ईर्ष्या-द्वेष आदि दुर्गुणों से दूर रहना चाहिए। इस प्रकार राजा में न केवल राजा के ही गुण वरन् श्रेष्ठ व्यक्तियों के सभी गुण होने चाहिए।
चाणक्य के अनुसार राज्य का यह कर्तव्य है कि आकस्मिक और प्राकृतिक आपदाओं से नागरिकों की रक्षा करे। राज्य को अपंग, शक्तिहीन, वृद्ध, रोगी और दीन-दुखियों का पालन-पोषण करना चाहिए।
राज्य को शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। राज्य का यह कार्य है कि साहूकार, व्यापारी, जादूगर, शिल्पी,नट, शासकीय अधिकारी और कर्मचारी आदि के शोषण-उत्पीड़न से प्रजा की भली-भाँति रक्षा करे। व्यापारी अनुपयुक्त दर से क्रय-विक्रय न कर सकें, इसके लिए राज्य को चाहिए कि वे नियम निर्धारित करे।
राज्य के इन कार्यों से विदित होता है, कि चाणक्य ने आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना कर ली थी। उन्होंने प्रजाहित को राज्य का लक्ष्य मान लिया था। चाणक्य वर्षा न होने के कारण अकाल के समय सैकड़ों साधुओं को नित्य भोजन कराते थे।
चाणक्य एक व्यवहार कुशल राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने नीति पर भी एक पुस्तक लिखी है। उसमें उनके ऐसे विचार हैं, जिनसे पता चलता है कि मौर्य साम्राज्य के निर्माता के रूप में वे सफल रहे। उन्होंने राजतंत्र का समर्थक होते हुए भी, निरंकुश स्वेच्छाचारी शासन का विरोध किया।
चाणक्य आज भी आधुनिक राजनीतिज्ञ, विचारकों, चिन्तकों में अग्रणी माने जाते हैं।
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